लिखना कब शुरू किया ठीक से याद नहीं, पर हाँ कुछ था कहानियों, कविताओं में जो हमेशा से मुझे अपनी ओर खींचता था। यही शब्द हमेशा से एक दोस्त की तरह मेरे साथ रहे हैं। कुछ बातें, कुछ अभिवाक्तियाँ सिर्फ इन के माध्यम से ही मैंने सबसे पहले इन्हीं के साथ बाँटना सीखा।

बस चंद पन्नों पे कुछ सतरें उतारी, उस को सहेज के रखा और वापस जिन्दगी की धुरी पर। इसी तरह ICWAI किया और कुछ देर नौकरी भी की। अपने इस शौक के जुनून में पत्रकारिता का कोर्स भी किया। लिखने पढ़ने का शौक कभी घटता तो कभी बढ़ता रहा, पर ख़त्म कभी नहीं हुआ।

इन्हीं तानो बानों में जिन्दगी अपनी रफ़्तार से बढ़ती गई और कब यह कलम दोबारा मेरे हाथ में आ गई पता ही नहीं चला। पर इस बार कोई छिपाव नहीं, कोई बंधन नहीं है। बस धुन है लिखने की—इस उम्मीद में कि शायद बदलाव आये।

एक छोटा सा बदलाव और है: सितम्बर 2012 से मैं आकाशवाणी में समाचार वाचिका के तौर पर भी जुड़ी हूँ। पर हाँ इस बार भाषा वो है जिसमें मैं बचपन से खुद को व्यक्त करती आई थी। पंजाबी। पर वहाँ जा कर पता चला कि जब हम इक लम्बे समय तक किसी से संबंध तोड़ लेते हैं तो चाहे कोई हमारा कितना भी अज़ीज़ क्यों न हो एक अजनबीपन सा आपके दरमियां आ ही जाता है। तो आज कल बस इसी पुरानी पहचान से वक़्त की गर्द झाड़ रही हूँ।

और हाँ इसी सफ़र में चलते-चलते कुछ छोटी-छोटी बिखरी कहानियों को भी चुनने की कोशिश कर रही हूँ।